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"इतना मत सोचो" कहना कितना सही? | Overthinking और Validation का सच | KhabarForYou

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Name:-MADHU SHARMA
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“इतना मत सोचो” - क्या सच में इतना आसान है? “Be positive.” “इतना मत सोचो।” “तुम बहुत overthink करते हो।” “अरे, ये तो बहुत छोटी-सी बात है, इसे इतना दिल पर लेने की क्या जरूरत है?” “ये तो सबके साथ होता है, तुम पहले नहीं हो।” शायद ये ऐसी पंक्तियाँ हैं जिन्हें हमने न जाने कितनी बार सुना होगा। और शायद न जाने कितनी बार दूसरों से कहा भी होगा।

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लेकिन क्या ये सिर्फ कुछ पंक्तियाँ हैं?

कभी सोचा है, एक छोटी-सी बात किसी व्यक्ति के मन पर कितना बड़ा असर डाल सकती है? कह देना बहुत आसान है - “इतना मत सोचो।” लेकिन क्या वास्तव में सोचना हमारे हाथ में है? हमारा मस्तिष्क लगातार काम करता है। विचारों का आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। हम किसी एक विचार को रोकने या उससे ध्यान हटाने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर कोई दूसरा विचार सामने आ जाता है। विचारों का यह सिलसिला चलता रहता है। फिर जब हमारे सामने कोई ऐसा व्यक्ति आता है जो अपनी परेशानी हमसे साझा करना चाहता है, तो हम कितनी सहजता से कह देते हैं - 

“इतना मत सोचो।”

“Relax करो।”

“Be positive, सब ठीक हो जाएगा।”

लेकिन क्या सचमुच वह व्यक्ति हमसे यही सुनने आया था? या वह सिर्फ अपनी बात कहने आया था? शायद उसे उस पल किसी समाधान की नहीं, बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो उसकी बात सुन सके, उसे समझने की कोशिश कर सके और उसकी परेशानी को छोटा किए बिना उसके साथ थोड़ी देर खड़ा रह सके। क्योंकि जब हम उसकी बात सुनने से पहले ही कह देते हैं - “सब ठीक हो जाएगा”, तो कभी-कभी अनजाने में उसके भीतर एक दूसरा सवाल जन्म ले सकता है - “अगर सबके लिए ये इतनी छोटी-सी बात है, तो फिर मैं ही इससे इतना परेशान क्यों हूँ?” और यहीं से परेशानी की एक दूसरी परत शुरू हो सकती है।


परेशानी के साथ शुरू होती एक दूसरी लड़ाई

जिस व्यक्ति के भीतर पहले से ही कोई परेशानी चल रही होती है, उसके भीतर धीरे-धीरे एक दूसरी लड़ाई भी शुरू हो सकती है - validation की लड़ाई। खुद को दूसरों की नजरों में सही साबित करने की, यह साबित करने की कि “समस्या मैं नहीं हूँ।” और कभी-कभी इसी कोशिश में व्यक्ति खुद को ही बदलने लगता है। उसे लगने लगता है कि शायद कमी समस्या में नहीं, मुझमें ही है। कोई बात भूल जाए तो लगता है - शायद मेरी याददाश्त ही कमजोर हो गई है।”

कोई काम उम्मीद के मुताबिक न हो पाए तो -  “शायद मैं किसी काम को ठीक से कर ही नहीं सकता।” किसी अपने का व्यवहार बदल जाए तो सवाल अक्सर बाहर नहीं, भीतर उठता है -  “शायद मेरी ही कोई गलती रही होगी।” धीरे-धीरे व्यक्ति अपनी समस्या से लड़ने के साथ-साथ खुद से भी लड़ने लगता है। और हर परिस्थिति के लिए खुद को जिम्मेदार मान लेना, उसे सामान्य लगने लगता है।

क्या हर परेशानी का कारण व्यक्ति खुद होता है? सुनने में तो हम शायद बचपन से यही सुनते आए हैं - “इंसान अपने दुखों का कारण स्वयं होता है।”


लेकिन क्या हर बार ऐसा ही होता है?

कई बार हमारी परेशानियों के पीछे ऐसे कारण भी हो सकते हैं, जिन्हें शायद हम जानते हुए भी अनदेखा कर देते हैं - हमारा वातावरण, किसी अपने के बदले हुए व्यवहार का असर, शरीर में होने वाले hormonal changes, कोई व्यक्तिगत क्षति या जीवन का कोई ऐसा अनुभव, जिसे हमने कभी ठीक से किसी के सामने कह ही नहीं पाया। और शायद कभी-कभी वजह सिर्फ इतनी भी होती है कि हमें बिना किसी judgement के सुना नहीं गया। हम इन बातों को जानते तो हैं, लेकिन शायद स्वीकार नहीं कर पाते। इसलिए उन्हें एक आसान-सी पंक्ति में समेट देते हैं - 

“अरे, ये तो सबके साथ होता है।” होता होगा। लेकिन क्या हर व्यक्ति उस परिस्थिति से उसी तरह गुजरता है? क्या हर किसी का उसे महसूस करने और उससे deal करने का तरीका एक जैसा होता है? शायद नहीं। किसी के लिए जो छोटी-सी बात है, हो सकता है किसी दूसरे के लिए वही उसके जीवन की किसी पुरानी चोट को छू जाए। इसलिए किसी की परेशानी का आकार बाहर से देखकर तय कर देना शायद उतना आसान नहीं, जितना हमें लगता है। हर बार समाधान नहीं, कभी-कभी सिर्फ सुनना अगली बार जब कोई अपना आपके पास अपनी परेशानी लेकर आए, तो हर बार उसके पास कोई समाधान लेकर जाना जरूरी नहीं। शायद बस इतना कहना काफी हो -  “हाँ, बोलो… मैं तुम्हें बिना किसी judgement के सुन रहा हूँ।” हो सकता है, आपके सुन लेने से उसकी समस्या तुरंत हल न हो। लेकिन शायद उसे उस पल यह राहत जरूर मिले कि कोई है जो उसे उसकी परेशानी समेत स्वीकार कर रहा है। क्योंकि कभी-कभी healing की शुरुआत समस्या के खत्म होने से नहीं, बल्कि इस एहसास से होती है -  “मैं इस सबके बीच अकेला नहीं हूँ।” और शायद किसी परेशान व्यक्ति के लिए इससे बड़ी राहत उस पल कुछ और नहीं होती।

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